तुर्की के मुसलमानों ने किस तरह पूरे दुनिया के मुसलमानों का सर गर्व से ऊंचा

तुर्की के मुसलमानोंतुर्की के मुसलमानों ने किस तरह पूरे दुनिया के मुसलमानों का सर गर्व से ऊंचा किया था अपनी कुर्बानी देकर।

आज से कई सौ साल पहले जब उस्मानिया सल्तनत की नेव रखी गई थी तो उसी वक्त से उस्मानिया सल्तनत के जितने सुल्तान थे उनकी ख्वाहिश थी कि वह इस्तांबुल पर राज करें इस्तांबुल उस वक्त उसमें क्रिश्चन रहा करते थे और वह तुर्की के हिस्से में नहीं था उस वक्त इस्तांबुल का नाम कस्तोतूनिया था जहां बड़ी तादाद में क्रिश्चियन रहा करते थे।

उस्मानिया सल्तनत के जेतने सुल्तान आए और उनका इंतकाल हो गया और वह अपने दिल में ख्वाहिश यह रखकर दुनिया से रुखसत कर गये कि वह इस्तांबुल पर राज करेंगे फिर उसके बाद एक सुल्तान आए जिनकी उम्र 21 साल थी उनका नाम सुल्तान मोहम्मद था जिन्होंने इस्तांबुल के लिए जंग लड़ी और तीसरी बार जंग में कामयाबी हासिल कर ली और इस्लाम का परचम को इस्तांबुल में लहरा दिया गया इस्तांबुल का उस वक्त इस्लाम बोल नाम रखा गया था जो मुसलमानों के लिए सबसे बड़ी फतेह थी।

तुर्की के मुसलमानोंतुर्की के मुसलमानों यानी के उस्मानिया सल्तनत का इतने देशों में राज चलता था कि जब उस्मानिया सल्तनत खत्म हुआ तो तकरीबन 45 देश आजाद हुए जो अलग-अलग देश बने जिनमें से जॉर्डन सीरिया सऊदी अरब हंगरी और कई यूरोपीय देश शामिल है।

उस्मानिया सल्तनत जो मुसलमानों का शान था जिसने मुसलमानों के लिए अपनी जान तक की कुर्बानी दे दी उस्मानिया सल्तनत को आगे बढ़ाने के लिए जिन्होंने मुसलमानों के लिए हमेशा बढ़-चढ़कर मदद की है चाहे वह मुसलमान कहीं के भी रहने वाले हो।

उस्मानिया सल्तनत जो 1923 में खत्म कर दिया गया एक साजिश के तहत अंग्रेजो और कई लोग जो मुसलमान थे लेकिन नाम के मुसलमान थे वह उस्मानिया सल्तनत के खिलाफ बगावत कर रहे थे क्योंकि उन्हें अपने देश में अपनी राजनीति चाहिए थी जिसके बाद उस्मानिया सल्तनत में यह कह दिया कि वह सऊदी अरब में कोई भी खून खराबा नहीं चाहते हैं उन्होंने सऊदी अरब को छोड़ दिया धीरे-धीरे करके पूरे उस्मानिया सल्तनत खत्म हो गई अब सिर्फ तुर्की ही बचा है जो उस्मानिया सल्तनत की राजधानी थी।

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